Poetry/ कविता

अम्माँ

अम्माँ

गइया बाँध दुआरे अम्माँ सुपवा चावल झारे अम्माँ कलशा में गंगाजल भरके पूरा घर छिटकारे अम्माँ अम्माँ..... संझाँ ढीबरी जारे...

सब बांट लूंगी- कविता

सब बांट लूंगी- कविता

जीवन की धूप में चलते चलतेजब लड़खड़ा जायेंगे तुम्हारे पांव,अपनी हथेलियों को फैलाकरमैं बनूंगी तुम्हारी धरा।जीवन की अंधेरी गलियों मेंजब...

छत

पहले जब गांव जाते थे- शाम सबेरे छत पर‌ तमाम किस्से होते थे। उनमें से कुछ सच्चे कुछ झूठे भी...

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